बालमुकुन्द गुप्त का जीवन एवं साहित्यिक परिचय

baalamukund gupt ka jeevan evan saahityik parichay deejie

द्विवेदी युगीन निबंध को गंभीर चिन्तन की स्वतंत्र कला बनाने वाले लेखकों में लेखक बालमुकुन्द गुप्त सर्वश्रेष्ठ निबंधकार थे। उनका जन्म 1863 ई. में हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा का जहाँ तक संबंध है, उस संदर्भ में यह कहा जा सकता है उनकी शिक्षा उर्दू-फारसी में हुई थी। वे एक साफगोई एवं स्वतंत्र दिमाग के लेखक एंव निबंधकार थे। वे अपने स्वभावानुसार लेखन करते थे। वे किसी दबाव एवं डर से किसी लेख को नहीं लिखते थे। वे स्वभाव से भी जिंदादिल एवं लेखन कला में भी मनमौजी थे। उनकी इसी प्रवृत्ति के कारण वे अपनी बात कहने में तनिक भी नहीं डरते थे। उनकी प्रकृति में भातेन्दु कालीन युग की तत्परता, शालीनता, कर्तव्य परायणता और राष्ट्रीय-बोध का अद्भुत मान्वय मिलता है। उनके सभी निबंध उनकी इसी प्रवृत्ति के परिचायक हैं। सन् 1907 ई. में 44 वर्ष की छोटी सी उम्र में दुनिया से चल बसे थे। अर्थात् उनका देहान्त हो गया था।

बालमुकुन्द गुप्त का जीवन एवं साहित्यिक परिचय

गुप्त जी को उर्दू का अच्छा-खासा ज्ञान था। उन्होंने उर्दू में ही अपना लेखन कार्य आरंभ किया था। उर्दू में गद्य-पद्य भी लिखा। उन्होंने अपनी पत्रकारिता उर्दू से ही शुरू की थी। उनके द्वारा सम्पादित पहले दो पत्र ‘अखबारे चुनार’ और ‘कोहेनूर’ उर्दू में थे। किन्तु राज-काज में उर्दू भाषा को स्थान दिए जाने के वे विरूद्ध थे। इस दृष्टिकोण में न तो उनका उर्दू के प्रति कोई द्वेष है न किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता ही। उनका यह भाव वैसा ही सहज-स्वामविक है, जैसी ब्रजभाषा के लिए था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके मन में ब्रजभाषा के प्रति गहरा लगाव एवं अनुराग था। उनकी परम्परा में बहुत बार दीक्षित भी थे और स्वयं ब्रजभाषा में लिखते थे, पर राज-काज की बात तो आगे है, सामान्य हिन्दी गद्य के लिए वे खड़ी बोली हिन्दी प्रयोग के समर्थक थे। व्यावहारिक राजकाज की भाषा के लिए ये देवनागरी में लिखित खड़ी बोली हिन्दी के ही पक्षधर थे, क्योंकि उर्दू के वैशिष्ट्य और सीमाओं दोनों को वे भली-भाँति समझते एवं पहचानते थे।

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सन् 1899 ई. में गुप्त जी ‘भारत मित्र’ पत्र के संपादक बनकर कलकत्ता आए। हिन्दी गद्य शैली में उर्दू शैली की रोचकता, सजवीता और प्रभावोत्पादकता को घुलमिलाकर उन्होंने जिस शैली का प्रणयन किया उसने हिन्दी पत्रकारिता और निबंध का नई दिशा प्रदान की। उन्होंने अखबार को तोप के मुकाबले खड़ा कर तत्कालीन वॉयसराय लॉर्ड कर्जन को राजनीतिक और आर्थिक नीतियों पर कटाक्ष एवं करारे व्यंग्य किये थे। 1904 ई. में ‘भारत मित्र’ से प्रकाशित ‘बॉयसराय का कर्तव्य’ शीर्षक शिवशंभु के पक्ष में लेखक ने तोखेपन और मिष्टाचार का जो समन्वय किया है वह ऊंची से ऊँची वक्त से टक्कर लेता है लॉन जैसे विख्यात ‘बॉयसराय-प्रथम के वक्तव्य पर टिप्पणी करते हुए शिवशम्भु नाम से लिखते हैं। उन्होंने स्वयं इस संबंध में कहा था कि भारत-भूमि को मैं किस्सा कहानी की भूमि नहीं, कर्त्तव्य भूमि नहीं, कर्त्तव्य भूमि समझता हूँ। उसी कर्त्तव्य के पालन के लिए आपको ऐसे कठिन समय में भी दूसरी बार भारत में आना पड़ा। माँ लॉर्ड ! इस कर्त्तव्य-भूमि को हम लोग कर्मभूमि कहते हैं। आप कर्त्तव्य-पालन करने आए हैं हम कर्मों का भोग भोगने । “

बालमुकुन्द गुप्त का जीवन एवं साहित्यिक परिचय

लेखन बालमुकुन्द गुप्त ने लॉर्ड कर्जन के शासन के काल में संबंधित राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को जिस कलात्मक और व्यंग्यपूर्ण ढंग से हिन्दी भाषी समुदाय के सामने रखा, वह उनकी निर्भीकता और साहस का साक्षी होने के साथ-साथ हमारी भाषा की व्यंजना-शक्ति और संप्रेषणीयता का भी अच्छा प्रमाण है। उनके इन निबंधों में ललित-निबंध के गुण दिखाई पड़ते हैं। उनका व्यक्तित्व वस्तु के इर्द-गिर्द छिपेहुए महत्त्वपूर्ण तथ्यों का प्रकाशन, प्रकृति और घटनाओं का व्यापक संदर्भ, स्वगत कथन तथा आत्म-चिंतन आदि मौजूद हैं।

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इसके अलावा ‘आत्माराम’ उपनाम से भी ‘अनस्थिरताविवाद’ संबंधी जो लेख गुप्त जी ने ‘भारत मित्र’ में प्रकाशित किये थे, वे भी व्यंग्य-विनोद, हास-परिहास और खंडन-मंडन की अपनी स्वंतत्र शैली-प्रस्तुत करते हैं। उन्हें भाषा की गहरी पहचान थी। व्याकरण-व्यवस्था के प्रति वे पूर्ण रूप से सजग थे। उनकी भाषा से सजगता, व्यंग्यात्मकता तथा हास्य-विनोद के भाव सहज ही मिल जाते हैं। उन्होंने अपनी भाषा में व्यंजना-शक्ति को उजागर करने के लिए लोकोक्तियों, मुहावरों तथा चलताऊ भाषा का भी प्रयोग किया है। जिससे भाषा में सारणर्भिता एवं अर्थवत्ता के दर्शन होते हैं। वे भाषा में तीखापन औज़ार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उनकी भाषा में मुक्तपन साफतौर पर झलकता है।

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भारतेन्दुयुगीन लेखकों की तरह ही उन्होंने भी लोक-साहित्य का रचनात्मक उपयोग किया है। मुकरियों और पहेलियों के क्रम में वे टेसू के गीत जैसे लोकमाध्यम का नया प्रयोग करते हैं। इन गीतों में बाहय प्रभावों के प्रति खुलापन और जन-जीवन के प्रति निष्ठा दोनों के बीच में वे संतुलन बनाने का प्रयास करते रहे हैं। इस गीत-शृंखला में वे राम का लीन राजनीति पर भी वे टिप्पणी करते हैं। सफल संपादक होने के नाते गुप्त जी की भाषा जन-सुलास, व्यावहारिक और सजीव है। भाषा में मुहावरे व लोकोक्तियों के प्रयोग से वे जीवंतता का संचार करते हैं।

बालमुकुन्द गुप्त साहित्यिक परिचय

वे छोटे-छोटे वाक्यों को स्पष्ट करते हुए चलते हैं। उनके कथनों में स्पष्टता, सरलता और प्रभावोत्पादकता देखने को मिलती है। वे अपनी बात को कहते हैं। उनकी भाषा-शैली की सबसे बड़ी विवेषता उनकी सरलता, चलतापन और चित्रात्मकता तथा व्यंग्य है। उनकी शैली उत्कृष्टता का प्रमाण है। उनकी भाषा-शैली इस बात का द्योतक थी कि हिन्दी भाषा अब अपने विकास के दूसरे चरण में है। उनका हिन्दी गद्य-साहित्य में नाम स्मरणीय रहेगा

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