भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख नारे- भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में कई ऐसी घटनाएं हुईं जब भूखे, नंगे और निहत्थे लोगों की भीड़ ने देशभक्ति की तरंग में सराबोर होकर भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ के नारे लगाते हुए न केवल तार और टेलीफोन के सम्पर्क छिन्न-भिन्न कर दिए वरन् पुलिस स्टेशनों तक पर अधिकार जमा लिया था। ‘वन्दे मातरम्’ इन दो शब्दों में न जाने क्या जादू था कि भारत माता के असंख्य वीर इस महामन्त्र का उद्घोष कर अंग्रेजों की लाठियों और गोलियों को हँस कर झेलने के अतिरिक्त अवसर पड़ने पर फाँसी के फंदों को सावन-भादों के झूलों की रेशमी डोरी समझ चूमते और उन पर झूलते रहे। जनमानस को उद्वेलित करने वाले ये प्रेरक उद्घोष अर्थात नारे दासता के गहन अन्धेरे के बीच उन भारतीयों के प्रतीक हैं जो स्वतन्त्रता के उजाले के लिए हर समय बेचैन थे। उन सब लोगों में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनका स्वाधीनता संघर्ष में कहीं उल्लेख नहीं कोई नाम नहीं परन्तु जिनका खून भारतमाता के चरणों में महावर की तरह अंकित है। इस संदर्भ में स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु किए गए लम्बे एवं संघर्षपूर्ण संग्राम के दौरान मूलमन्त्र बने प्रतीक एवं नारों की पृष्ठभूमि का अध्ययन अप्रासंगिक न होगा। सुविधा की दृष्टि से हम इनको निम्र क्रम दे सकते हैं –

भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख नारे

१. वन्दे मातरम्
२. स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
३. सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
४. इन्किलाब जिंदाबाद
५. भारत छोड़ो
६. करो या मरो
७. जय हिन्द
८. तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दिलाऊंगा
९. दिल्ली चलो

वन्दे मातरम्

१. वन्दे मातरम्भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख नारे -> स्वनाम धन्य बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय (जन्म- 26 जून, 1839 – मृत्यु 8 अप्रैल, 1894) ने भारत के प्रथम राजनीतिक उपन्यास ‘आनन्दमठ’ की रचना कर उसमें ‘वन्दे मातरम्’ गीत का समावेश किया। विश्वास किया जाता है कि बंकिम द्वारा अक्तूबर 1875 में ‘आमार दुर्गोत्सव’ शीर्षक लेख लिखने के बाद ही वन्दे मातरम् ‘गीत लिखा गया था । यद्यपि सन् 1886 में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में कविवर हेमचन्द्र वंदोपाध्याय द्वारा कुछ स्वरचित पंक्तियों को ‘वन्दे मातरम्’ के कुछ अंशों को जोड़ कर गाया गया था तथापि राष्ट्रवाद के मूल मन्त्र के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ हजारों कण्ठों द्वारा प्रथम बार 7 अगस्त 1905 के भाग्यशाली दिन कलकत्ता के ऐतिहासिक टाऊन हाल की विशाल सभा जिसमें स्वदेशी की शपथ ली गयी थी, उद्घोषित हुआ था। मात्र दो शब्दों ‘वन्दे मातरम्’ से समूची अंग्रेज़ नौकरशाही डोल उठी। लेफ्टिनेन्ट गवर्नर फुलर ने ‘वन्दे मातरम्’ गीत एवं नारे पर प्रतिबंध लगा दिया। यहाँ यह लिखना प्रासंगिक होगा कि बंगाल-विभाजन के विरोध में बैरिस्टर अब्दुल रसूल की अध्यक्षता में राज्य परिषद् का प्रान्तीय राजनीतिक अधिवेशन 14 और 15 अप्रैल 1906 को बारीसाल (पूर्वी बंगाल) में करने का निर्णय लिया गया। निश्चित दिन राजा बहादुर की हवेली से विशाल जुलूस निकाला जिसमें अन्य के साथ पैदल चल रहे थे मोती लाल घोष, तरुण नेता विपिन चन्द्र पाल और अरविन्द घोष । जुलूस अभी रास्ते पर भी नहीं पहुंचा था कि पुलिस ने अन्धाधुंध लाठियां बरसाना शुरु कर दीं। मारने वाले हाथ थक गये पर जनसमूह द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ के घोष की हुँकार में कोई कमी न आयी। भारत के इतिहास का यह पहला लाठीचार्ज था । ज्योतिबा फुले के नारी संबंधी चिंतन

स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है

२. स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है – इस घोष के जनक थे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जिनका जन्म 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरि (महाराष्ट्र) में और देहावसान 31 जुलाई 1920 को हुआ था। सन् 1917 में लोकमान्य तिलक और श्रीमती एनी बेसेन्ट के नेतृत्व में स्वराज्य (होमरूल) आन्दोलन सूखे जंगल में दावाग्नि की तरह देश भर में फैल रहा था। स्वराज्य का सन्देश सुनाने के उद्देश्य से वह भ्रमण करने लगे। ‘स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे प्राप्त करके रहेंगे’ यह मूलमन्त्र लोकमान्य ने इसी यात्रा में देशवासियों के कानों में फूँका था। स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान मिली सजाओं को आपने जेल में न केवल शान्ति और धैर्य से बिताया बल्कि ‘गीता रहस्य’ और ‘आर्कटिक होम ऑफ दि वेदाज’ जैसे अन्य ग्रन्थों की रचना की। आपकी मृत्यु के उपरान्त गांधी जी ने कहा था, ‘पुरुषों में पुरुष सिंह संसार से उठ गया, देशभक्ति उनका धर्म हो गई थी। जितनी स्थिरता और दृढ़ता के साथ उन्होंने स्वराज्य के लिए काम किया, उतना और किसी ने नहीं किया। Benefits of playing video games

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

३. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है– काकोरी क्रान्तिकारी काण्ड के अमर शहीद पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ रचित यह ग़ज़ल क्रान्तिकारियों का प्रिय गाना था जिसे वह अदालत जाते हुए और वहाँ से जेल वापिस आते हुए समूह गान के रूप में तन्मय होकर गाते थे। राह में उनके दर्शनार्थ एकत्रित लोग न केवल श्रद्धा विभोर हो इसे सुनते वरन् स्वर में स्वर मिलाकर गाने भी लगते। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ब्रिटिश राज में इसका पहला प्रकाशन लाहौर से छपने वाले उर्दू समाचार पत्र ‘वन्दे मातरम्’ में वर्ष 1929 में हुआ था। उसके बाद इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। ग़ज़ल का मत्ला (पहला शेर) इस प्रकार है-
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है
जोर कितना बाजूए क़ातिल में है ॥

इन्किलाब ज़िन्दाबाद

४. इन्किलाब ज़िन्दाबाद – इन्किलाब जिन्दाबाद अर्थात क्रान्ति चिरंजीवी हो, ‘वन्दे मातरम्’ के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण नारा था। इन दो शब्दों का प्रथम प्रयोग युगद्रष्टा अमर शहीद भगत सिंह द्वारा अपने साथियों के साथ 17 दिसम्बर 1928 को पंजाब केसरी लाला लाजपतराय की मृत्यु के प्रतिशोध में जे० पी० साण्डर्स की हत्या करने के बाद अगले दिन यानी 18 दिसम्बर को लाहौर नगर में जगह-जगह दीवारों पर चिपकाये गये अंग्रेज़ी के छोटे पोस्टरों में लिखित रूप में किया गया था। इन पोस्टरों जिन का कागज़ गुलाबी था और स्याही लाल थी, पर ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना’ की पंजाब शाखा के सेनापति बलराज के हस्ताक्षर थे। एक क्रान्तिकारी नारे के रूप में इसका उद्घोष भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली में असेम्बली हाल में बम फेंकने के बाद किया गया था जिसके फौरन बाद उनके द्वारा पूरे जोश में लगाया गया दूसरा नारा’ साम्राज्यवाद का नाश हो (Down with Imperialism) गूंजा था । बड़े धैर्य से नारे बुलन्द करते हुए उन्होंने कुछ पर्चे भी हाऊस में फेंके जिन पर अंग्रेज़ी में लिखा था, ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ – बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत (Loud Voice To Make Deaf Hear)। क्रान्तिपुंज सुभाष चन्द्र बोस भी आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों को सम्बोधित करते हुए अपने संदेश अथवा विशेष आदेश का समापन इसी उद्घोष के साथ करते थे।

५ और ६.’ भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो

५ और ६.’ भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ – राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा यह दोनों नारे 8 अगस्त 1942 की रात को बम्बई के गवालिया टैंक के ऐतिहासिक मैदान में एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए दिये गये थे। उनका सन्देश था, ‘मैं अग्रेज़ों को चेतावनी देता हूँ कि या तो खुद ही भारत का शासन भारतीयों के हाथों में सौंप कर यहाँ से चले जाओ अन्यथा तुम्हें सम्पूर्ण भारतीय राष्ट्र की उमड़ती हुई शक्ति का सामना करना पड़ेगा।’ इसके बाद ही उन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा देते हुए कहा कि ‘एक मन्त्र है, छोटा सा मन्त्र, जो मैं आपको देता हूँ। उसे आप अपने हृदय में अंकित कर सकते हैं और अपनी सांस-सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। वह मन्त्र है करो या मरो, या तो हम भारत को आज़ाद कराएंगे या इस कोशिश में हम अपनी जान दे देंगे।’ तत्पश्चात सारे देश में जो कुछ हुआ उसे स्वतन्त्रता संग्राम में ‘ अगस्त क्रान्ति’ के नाम से जाना जाता है।

जय हिन्द

७. जय हिन्द – 29 अक्तूबर 1941 को क्रान्ति किंजल्क सुभाष चन्द्र बोस जो ओर्लोदो मसोटा के छद्म नाम से बर्लिन में रह रहे थे, ने एक अभिजात्य बस्ती में ‘ आज़ाद हिन्द केन्द्र’ (Free India Center) की स्थापना की। केन्द्र की 2 नवम्बर को हुई पहली बैठक में जो विभिन्न प्रस्ताव पास हुए उनमें से एक यह था कि मुखिया यानी लीडर को ‘नेताजी’ कहा जाए, तथा आन्दोलन/संघर्ष का युद्ध घोष ‘जय हिन्द’ होगा। यहाँ यह लिखना भी असंगत न होगा कि आजाद हिन्द केन्द्र’ को एक कूटनीतिक मिशन का दर्जा दिया गया था। स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व आज़ाद हिन्द फौज का युद्ध घोष ‘जय हिन्द” आज भी जनप्रिय है। परन्तु इस सम्बन्ध में यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि वर्ष 1914-17 के बीच स्वनामधन्य राजा महेन्द्र प्रताप, चम्पक रमण पिल्लै, डॉ० पाण्डुरंग खानखोजे, केदारनाथ केरसस्प आदि ने गदर पार्टी के अपने अन्य क्रान्तिकारी साथियों के साथ मिलकर तुर्की-ईरान क्षेत्र में ‘अस्थायी हिन्द सरकार’ की स्थापना कर लगभग बारह हजार सैनिकों की सेना तैयार की थी। यह सैनिक अंग्रेज़ सेना की चौकियों और छावनियों पर छापे मारते अथवा युद्ध करते समय निम्नलिखित गीत गाकर युद्ध यात्रा करते थे। इस गीत में ‘जय हिन्द’ शब्द का प्रयोग हुआ है –
जय जय जय जय हिन्दू
तोपों बन्दूकों हथियारों से
आज़ाद करो जी हिन्द
हिन्द हमारी जान है
और हिन्द हमारा प्राण
भगत बनें हम हिन्द के
और हिन्द के कुरबान

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दिलाऊंगा

. तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दिलाऊंगा – क्रान्तिपुंज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज के वीर सैनिकों को 4 जुलाई 1944 के एक सन्देश में कहा, ‘मित्रो,स्वाधीनता संग्राम में मेरे साथियो! आज मैं सबसे बढ़कर आपसे एक चीज़ माँगता हूँ, मैं आपसे खून माँगता हूँ। शत्रु ने जो खून बहाया है उसका बदला खून से ही लिया जा सकता है। खून से ही स्वाधीनता की कीमत चुकाई जा सकती है। मुझे अपना खून दीजिए, मैं आपको आज़ादी दिलाऊँगा।’

दिल्ली चलो

९. दिल्ली चलो – भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख नारे ->इस नारे का उद्घोष क्रान्ति के अग्रदूत नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के म्यूनिसिपल बिल्डिंग के सामने वाले विशाल मैदान में आई० एन० ए० के सैनिकों को सम्बोधित करते हुए किया था। उन्होंने कहा, ‘सन् 1939 में जब जर्मनी ने फ्रांस पर आक्रमण करके अपना युद्ध अभियान शुरु किया तो सबकी ज़बान पर एक ही नारा था, ‘पेरिस चलो, पेरिस चलो’ । सन् 1941 में जापानी सैनिकों ने जब अपना युद्ध अभियान शुरु किया तो उनका नारा था ‘सिंगापुर चलो, सिंगापुर चलो’ । मेरे साथियो, सिपाहियो! आपका नारा होगा, ‘दिल्ली चलो, दिल्ली चलो’ । मैं यह नहीं कह सकता कि विजय का दिन देखने के लिए हममें से कितने जीवित रहेंगे परन्तु मैं इतना जरूर जानता हूँ कि अन्त में विजय हमारी ही होगी और हमारा काम तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक अपनी विजय परेड दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के प्रांगण में न कर लेंगे।’

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