दीपदान एकांकी की मूल संवेदना

दीपदान एकांकी, deepadaan ekaankee

दीपदान एकांकी की मूल संवेदना -> प्रस्तुत एकांकी ‘दीपदान’ रामकुमार वर्मा का एक प्रसिद्ध एकांकी है। जो इतिहास की एक घटना पर आधारित है। लेखक ने उपलब्ध सामग्री को ऐतिहासिक संदर्भ में प्रस्तुत किया है। उसने अपनी कल्पना-शक्ति के द्वारा उसे नई पृष्ठ-भूमि में व्यक्त किया है। भले ही एक ही घटना को आधार बनाया है, परंतु उसे बहुत ही सूझ-बूझ से प्रस्तुत किया है। प्रसिद्ध पात्रा पन्ना धाय माँ की गरिमा गौरव एवं विशिष्ट अवदान को ध्यान में रखकर इस एकांकी की रचना की है, जिसमें वह कथानक को उसी संदर्भ में प्रस्तुत करने में भी सफ़ल रहा है।

महाराणा, साँगा, जो चित्तौड़ के राजा थे। उनके स्वर्गस्थ होने के बाद उनके छोटे पुत्र को उत्तराधिकारी के रूप में राज्य की गद्दी पर बैठाना था। वह उनकी अभिलाषा थी। मगर महाराणा साँगा के भाई पृथ्वीसिंह का दासी-पुत्र बनवीर सिंह उसके इस शुभ कार्य में बाधा बन जाता है। वह उसे मार कर स्वयं राजगद्दी संभालना चाहता है। वह षड्यंत्र का रास्ता अपनाता है। सारे सैनिकों को अपने अधीन कर लेता है। उनके बल पर ही पुत्र उदयसिंह जो 14 वर्ष का है, को मारना चाहता है। मगर उदयसिंह की धाय माँ पन्ना ऐसा नहीं होने देना चाहती है। वह उसे बचाने का भरसक प्रयास करती है।

दीपदान एकांकी की मूल संवेदना

वह स्वयं को भी बलिदान करने को तैयार है। बाद में, वह अपने 13 वर्ष के पुत्र चंदन को उदयसिंह को बचाने के चक्कर में बलिदान कर देती है। बनवीर उसे उदयसिंह के स्थान पर लेटे होने की वजह से उसे उदयसिंह समझ लेता है और उसे मार देता है। वह समझता है कि उसकी राह का काटा हट गया है। इस तरह से लेखक ने छोटे से कथानक को आधार बनाकर इस एकांकी की रचना की है। एक ही कक्ष में यह घटना घट जाती है। पन्ना अमर हो जाती है।

एकांकीकार को अपनी से कहने का अवकाश नहीं रहता । उसे पात्रों तथा संवादों के माध्यम से अपनी बात कहनी पड़ती है। लेकिन प्रत्येक एकांकी के पीछे एकांकीकार का कोई-न-कोई संवेदना, समस्या, भावना अथवा जीवन-दृष्टि होती है। सांकेतिक रूप से एकांकीकार जाने अनजाने अपनी अभिव्यक्ति रचना में देना चाहता है। इसे ही उद्देश्य कहा जा सकता है। एकांकीकार की सफलता इसी में है कि उद्देश्य कथावस्तु के विकास का अनिवार्य और तर्क-सम्मत परिणाम हो। वह ऊपर से थोपा हुआ नहीं होना चाहिए। यह भी पढ़ें -> ज्योतिबा फुले के नारी संबंधी चिंतन

दीपदान एकांकी का उद्देश्य भारतीय के हृदय में देश-प्रेम और कर्त्तव्य-पालन का जज्बा पैदा करना है।

दीपदान एकांकी की मूल संवेदना

दीपदान का उद्देश्य भारतीय के हृदय में देश-प्रेम और कर्त्तव्य-पालन का जज्बा पैदा करना है।
इसीलिए एकांकीकार ने ऐतिहासिक कथावस्तु का चयन किया है। जिन दिनों एक एकांकी की रचना की गई, उस समय देश पराधीन था इसी परिप्रेक्ष्य में एकांकीकार ने राजपूताने की गौरवपूर्ण घटना को कथानक का आधार बनाया है। राजपूताना में देश-भक्ति, राजभक्ति और कर्त्तव्य-पालन के लिए एक से बढ़कर एक बलिदान हुए हैं। इसमें एकांकीकार ने पन्ना धाय के महान् बलिदान को चित्रित किया है। वह धाय कर्त्तव्य की बलिवेदी पर अपने पुत्र तक का सहर्ष उत्सर्ग कर देती है। वह त्याग और बलिदान की साक्षात् रूप है। एकांकीकार ने कर्तव्य-पालन के मध्य पवित्र करुणा को उभार दिया है। उसका हृदय कमल के समान कोमल है, वज्र के समान कठोर है, और चित्तौड़ के आखिरी, दीपक की रक्षा के लिए वह अपने पेट से पैदा चंदन को कुर्बान कर देती है। यह भी पढ़ें -> भारत-दुर्दशा की मूल संवेदना

वस्तुः एकांकीकार पन्ना के चरित्र के माध्यम से भारतीय नारियों के हृदय में कर्तव्य पालन की भावना को प्रस्तुत करना चाहता है। वह उन्हें संदेश देना चाहता है कि देशभक्ति के आडे यदि पुत्र-मोह उपस्थित हो जाए तो उसे भी कुर्बान करने में हिचकिचाहट नहीं करनी चाहिए। राष्ट्रहित के लिए तो व्यक्तिगत हित का बलिदान करना ही पड़ता है। स्वार्थलिप्सा व्यक्ति को अधम में अधम कार्य करने के लिए विवश कर देती है, जैसे बनवीर ने स्वार्थपूर्ति के लिए न केवल महाराणा विक्रमादित्य की हत्या की अपितु चौदहवर्षीय कुंवर उदयसिंह के धोखे में पन्ना धाय के पुत्र चंदन की हत्या कर दी, जो निरपराधी था। कुंवर उदयसिंह के तो संरक्षण का बोझ भी उसी पर था। पन्ना का चरित्र आज भी देशभक्तों में प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यही उद्देश्य रचनाकार का प्रतीत होता है। यह भी पढ़ें > Home remedies for sleep apnea

दीपदान एकांकी की मूल संवेदना

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दीपदान एकांकी

दीपदान एकांकी की मूल संवेदना -> इस एकांकी में राणा साँगा के छोटे पुत्र कुंवर उदय सिंह को राजगद्दी पर बैठना है, परंतु राणा साँगा के भाई पृथ्वी सिंह के पुत्र बनवीर को यह पसंद नहीं है। वह उदयसिंह को मारकर अपने रास्ते से उसे हटाना चाहता है। वह सभी सैनिकों को अपने वश में कर लेता है। सामंत भी उससे डरते हैं केवल पन्ना धाय है जो कुंवर उदयसिंह को बचाना चाहती है। वह उसे हर कीमत पर बचाना चाहती है, क्योंकि उदयसिंह की परवरिश उसी के द्वारा हो रही है। मगर वह अभी छोटा है। यही समस्या है कि वह अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकता है। तब पन्ना को उसकी रक्षा के लिए आगे आना पड़ता है। मगर उसे ऐसा करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। deepadaan

वह इसके लिए स्वयं भी लड़ने को तैयार हो जाती है। मगर यह सफ़ल उपाय नहीं था। तब उसे एक निश्चित उपाय अपनाना पड़ता है। उसे अपने पुत्र का बलिदान देना पड़ता है। तब उसे अपने उद्देश्य में सफलता मिलती है उदयसिंह के प्राणों की रक्षा हो पाती है। यही एकांकीकार का उद्देश्य है जिसमें वह सफ़ल हो पाता है। यही एकांकी का प्रमुख उद्देश्य है।deepadaan ekaankee

एकांकीकार ने तत्कालीन वातावरण, समय एवं परिस्थितियों को यथार्थ रूप में व्यक्त किया है।
राजमहलों में होने वाले षड्यंत्रों को भी दर्शाना भी उसका उद्देश्य रहा है, जिसमें वह सफ़ल रहा है। पन्ना धाय माँ के चरित्र को भी विशिष्ट रूप में दिखाना तथा भारतीय नारी के बलिदान को भी ऐतिहासिक तथा विशिष्टता प्रदान करना रहा है। वह सच्चे अर्थों में राजपूतानी है, जिसने अपने दायित्व एवं कर्त्तव्य को गरिमा प्रदान की है। एकांकीकार ने पूरे एकांकी में यही दर्शाया है। निश्चित रूप में डॉ. रामकुमार वर्मा का एकांकी हर दृष्टि से एक सफ़ल एकांकी है। deepadaan ekaankee

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